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Mother's Day

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बाहर रहता हूं, घर से दूर, अजनबियों के साथ। है कुछ दोस्त, जिन्हें अपना कह सकूँ, पर घर तो घर होता है।  जब भी छुट्टियाँ होती है, घर जाने का खयाल आता है । अंदर एकदम से खुशी की लहर उठ जाती है। पता होता है घर पर कुछ करना नहीं है, बस आराम करना है, सुस्ताना है और समय बर्बाद ही करना है। बावजूद इसके घर तो जाना है। कभी कभी तो सोचता हूं घर न जाऊँ। घर जाकर करूँगा भी क्या, यहीं पर रुकता हूँ, बचा हुआ काम खत्म कर लेता हूं। यहां रहूंगा तो आगे के काम को भी जल्दी से शुरू कर सकूंगा ताकि वक़्त आने पर सब संभालने में आसानी होगी । मगर एक खयाल जब आता है, तब सारी दुविधाओं का अंत हो जाता है। घर जाने पर माँ से मिलूंगा । यही खयाल काफी है सब कुछ छोड़ छाड़ कर घर लौट जाने के लिए। आज भी जब घर को जाता हूं, सबसे पहले माँ को ढूंढता हूँ। वैसे तो जब मालूम होता है कि मैं घर आने वाला हूं तो राह ताके इंतज़ार में रहती है, लेकिन जब बिना बताए जाता हूं तो हर कमरे में, रसोई में हर जगह ढूंढता हूँ कि माँ कहां है। माँ के मिलने पर ही चैन आता और बाकी कोई काम किया जाता है। एक बात तो ज़रूर है, जब माँ दिख जाती है तो सफर का सा...