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फाँसी पर लटकते किसान

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सूख रहे सब होँठ यहां बूँद बूँद को तरसने लगे है धरती फट के चीख रही पर पेड़ फिर भी कटने लगे हैं मेरे भाई के घर पर दाना नहीँ बच्ची भूखी सोने लगी है छाती पर कर्ज़ का खंजर है और जमीन बंजर होने लगी है मौसम जैसे रूठ गया है उल्टी दिशा में नदियां बहती ये रोज़ रोज़ की कड़वी हवा चट्टानों से कम, इंसानो से ज्यादा है डरती लाल हो पड़ी है आंखें रोने तक को आँसू नहीँ आसमान की ओर है तकते जल चुके हैं रूह सभी जिस्म पे दरारे हैं टूटी हुई मुस्कान बढ़ रही मीनारें और ढह रहे हैं मकान मुरझा रही है धरती मेरी छाया है मौत का समा विफल होने को इंसान अंत का ये इम्तहाँ सुकून की घड़ी नहीँ मर रहा है इंसान फोड़ते है सर चट्टानों से फाँसी पर लटकते किसान।                                                 ~RV

नारी

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ढोंग के बीच जो भक्ति है उसको कहते हम नारी हैं दुर्बल में जो शक्ति है उसको कहते हम नारी हैं जिसके कदमों में जन्नत है उस माँ का जग आभारी है ममता जिस जिसके हृदय में है उसको कहते हम नारी हैं सबके हित में जो समर्पित हर आत्मा संस्कारी है उस संस्कार को जो न मिटने दे उसको कहते हम नारी हैं झुक जाए हर शीश जहां वह मंदिर, मस्जिद नारी है रंक को भी राजा बनादे साथ खड़ी जब नारी है जिसके ऊपर ब्रह्मांड के निर्माण की ज़िम्मेदारी है वो प्रकृति, वो जननी और धरती माँ भी नारी है हर क्षेत्र में है सर्वश्रेष्ठ ऐसी उसकी कलाकारी है वो अबला नहीँ, लाचार नहीँ वो सर्वशक्तिशाली नारी है मैं भी नारी, तुम भी नारी हम सबके भीतर नारी है जिस भाव को पूजे दुनिया सारी उसको कहते हम नारी हैं                                           ~RV

वो वक़्त तेरा नहीँ

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आंसुओं में बह रहा वो रक़्त तेरा नहीँ गुज़र रहा है जो बुरा वो वक़्त तेरा नहीँ सब्र कर ज़रा तू बंदे यह घड़ी है इम्तहान की यूँही गुज़र ये जाएगा मालिश है यह थकान की अंधेरा तुझसे कहता है सवेरा तू दिखलायेगा उसको ज़रा अपना के देख तुझको भी यह अपनाएगा ख्वाहिशें होंगी पूरी अभी हार कर ठहरना नहीँ जो रह गया है अधूरा वो वक़्त तेरा नहीँ पहने हुए जो घूमता चेहरा नहीँ नकाब है हटा कर तो देख ज़रा बादलों में तेरे ख्वाब है उनको तू उड़ान दे वक़्त सुधर जाएगा हवा के झोंके की तरह बुरा वक्त भी गुज़र जाएगा बन मशाल ऐसा जो काली रातों से डरा नहीँ गुज़र रहा है जो बुरा वो वक़्त तेरा नहीँ अभी है मौका सीख ले जबतक ये वक़्त गुज़रा नहीँ जिसको तू बुरा है सोचता शायद वो वक़्त बुरा नहीँ                                           ~RV

चेहरे

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यूँ ही आते जाते खूबसूरत आवारा रास्तों पर कितने ही अनजान चेहरे दिख जाते हैं। कुछ चेहरे अनजान होते हैं, कुछ अनजान लगते हैं। कुछ पराये होते हैं, कुछ पराये लगते हैं। कुछ अपने होते हैं, तो कुछ अपने लगते है। हर चेहरे को देख मन में उत्सुकता सी जाग जाती है हर चेहरा कोई कहानी ज़रूर सुनाती है। कोई चेहरे को मुखौटा बना कर  दर्द छिपाता है, दुःख छिपाता है तो कोई चेहरे को दर्पण बना कर अपनी जीवनी कह जाता है। कुछ चेहरे ऐसे जैसे मुरझाये झाड़ कुछ ऐसे जैसे फूलों भरा डाल कुछ चेहरों की लालिमा देख मन फूले नहीं समाता कुछ चेहरों का रंग मन को ही नहीं भाता अब तो चेहरे, चेहरे नहीं बन चुके हैं मुखौटे सच्चाई ऊपर दिखा कर, अंदर से है झूठे। मुखौटे के पीछे ही होता असली चेहरा कुछ लोग ही रह गए हैं बाकी जिनका मन अंदर बाहर दोनों तरफ से एक सा ठहरा। ऐसे ही इत्तेफ़ाक़ से कितने अनजान चेहरे मिल जाते है, उनमें से कुछ अपने हो जाते है, कुछ सपने हो जाते हैं ।                           ...