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Showing posts with the label हिंदी कविता

विरह की यह यातना

1. यह कैसी है बात प्रिये? क्यों नहीँ हम साथ प्रिये? विरह की ये यातना अब न होगी बर्दाश्त प्रिये। 2. कितनी बार ही लिखता हूँ मैं अपने दिल की बात प्रिये, प्रेमपत्र का एक तो उत्तर मुझको हो साक्षात प्रिये। 3. दूर से ही निहार के तुमको बढ़ जाती है प्यास प्रिये, मुझको न तड़पाओ और रुक जाएंगे स्वास, प्रिये! 4. ऐसा ही चलता रहा हो जाएंगे बर्बाद प्रिये, अब ऐसी व्यथा से मुझको करदो तुम आज़ाद प्रिये। 5. अब मुझको बुलवालो तुम कुछ तरकीब लगालो तुम विरह की ये यातना अब न होगी बर्दास्त प्रिये। ________________________________-----ऋषव प्रिये: (here) IIT KGP 1. Online Semesters विरह: separation यातना: pain बर्दास्त: tolerance 2. प्रेमपत्र: All the e-mails to authorities साक्षात: visible 3. Virtual Campus tours, Fests etc. निहारना: to look 4. Career व्यथा: internal pain 5. Open Campus😭

वो वक़्त तेरा नहीँ

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आंसुओं में बह रहा वो रक़्त तेरा नहीँ गुज़र रहा है जो बुरा वो वक़्त तेरा नहीँ सब्र कर ज़रा तू बंदे यह घड़ी है इम्तहान की यूँही गुज़र ये जाएगा मालिश है यह थकान की अंधेरा तुझसे कहता है सवेरा तू दिखलायेगा उसको ज़रा अपना के देख तुझको भी यह अपनाएगा ख्वाहिशें होंगी पूरी अभी हार कर ठहरना नहीँ जो रह गया है अधूरा वो वक़्त तेरा नहीँ पहने हुए जो घूमता चेहरा नहीँ नकाब है हटा कर तो देख ज़रा बादलों में तेरे ख्वाब है उनको तू उड़ान दे वक़्त सुधर जाएगा हवा के झोंके की तरह बुरा वक्त भी गुज़र जाएगा बन मशाल ऐसा जो काली रातों से डरा नहीँ गुज़र रहा है जो बुरा वो वक़्त तेरा नहीँ अभी है मौका सीख ले जबतक ये वक़्त गुज़रा नहीँ जिसको तू बुरा है सोचता शायद वो वक़्त बुरा नहीँ                                           ~RV

तन्हाई

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फसी कैसी बेड़ियों में सियाही है बढ़ रही मेरे पन्नो की तन्हाई है, कलम से मेरे सोच की ऐसी जुदाई है, थम सी गयी मेरी सारी लिखाई है। मन भर न कुछ सोच सकू अब न ही लिख सकूँ कुछ भी हाथों में कलम पकड़ूँ जब उड़ जाते खयाल सभी भटकता हूँ फिर रहा अब किसी प्रेरणा की तलाश में बिन कल्पना ठहर सा गया जैसे ज़िंदा कोई लाश मैं लगता है शब्द मुझसे रूठ गए उनसे बंधन जैसे टूट गए कोशिश जितनी भी करूं वो पास आने से रहे कभी कभी हूँ सोचता क्या दर्द मेरे मिट गए? खुदसे हूँ मैं पूछता क्या तकलीफ सारे सिमट गए? क्या लहू की स्याही सूख गई? क्या माँ की ममता चूक गयी? है कहाँ वो कविता  जो क्रांति की आग लिए फिरती थी है कहाँ वो गाथा जो हर गरीब की आत्मकथा कहती थी क्या उस क्रांति की आग बुझ गयी? क्या गरीबी की चीख सुनाई देनी बंद हो गयी? क्यों खुदको बयान करने की क्ष्यमता मैने खो दिया? या फिर मुझको जो कुछ कहना था वो सारी बातें भूल गया? क्या नहीँ पहुंचती मेरी बातें उन सारे कानों तक? क्या मेरा संदेशा नहीं पहुंचा सारे ठिकानों तक? क्यों युवा पीढ़ी है खामोश...

मैँ कल से आज को आगया।

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मैं कल की बाहों से निकल कर जब आज के छाओं तले आगया हर गम निराशा और तन्हा सफर खुशी के भीड़ से मेरा परिचय करा गया अब हर शाम के रंग खिल रहे मौसमों के खुशबू बदल रहे उठते गुज़रते ये आसमान से चांद सूरज मिल रहे कर चला में दिल की आज मोह माया से परे मौत से बुरी उसकी ज़िन्दगी जो नई राह पे चलने से डरे चल तो रहा था कल को में ज़िन्दगी क्यों थमी सी थी बंध गया था यादों से आंखों में हरपल नमि सी थी जो आज को मैं हुँ आगया बंधन मैं सारे मिटा गया अपने ही नज़रों के सामने जीता जागता छा गया बढ़ता रहूँ मैं तूफानों में सवालों की रुक गया तो टूट कर बिखर जाएगा कश्ती मैं सपनों की ले चलूँ मेरा किनारा तो आएगा रोको न मुझको आज तुम कहीं ऐसा मौका फिर आए ना अगर आज जो में न चला कहीं वक़्त मुझको भुलाये ना "मैं" की आग बुझ गयी अहंकार जल गया जो कल के गहरे समंदर से मैं आज को बाहर आ गया न अब है रोकती कमी कोई मेरे राज़ दिल से उभरने से है अब इरादा आसमान का ज़मीन पर टिकाये पैरों को मैं क्यों खड़ा।                ...

पहल

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चल करते है एक पहल एक पहल जिसकी आगोश में ही आने से हो जाए सारी मुश्किलें सरल। सिर्फ मुश्किलें ही सरल नहीं जो कोई भी जुड़े इस पहल से हर काम हो जाये उसके सफल इस पहल में कुछ आशाएं डालते हैं इस पहल में कुछ दुविधाएं घोलते हैं। दुविधाएं अपने लिए नहीं दुविधाएं ज़रूरतमंदों की कुछ उनसे लाऐं, कुछ अपने मिलाएं मिलकर सुलझाएं, इस दुनिया को थोड़ा और बेहतर बनाएं। हो इस पहल में आशा जो दे सके किसी टूटे दिल को दिलासा हो इस पहल में चाह जो दे सके भटके हुए को नई राह लड़खड़ाए कोई अगर हाथ थाम कर जाए वो सम्हल चल करते हैं एक पहल इस पहल की रोशनी पूरी करदे हर कमी सारी नहीं तो क्या हुआ, कुछ तो बंज़र ज़मीन में भर सकते हैं नमी। संकल्प करते हैं अटल चल करते है एक पहल एक पहल जिसकी आगोश में ही आने से हो जाये सारी मुश्किलें सरल।                                               ~RV

माँ

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​तू दूर रहे, या पास रहे खुश रहे, उदास रहे। चेहरे को पढ़ लेगी वो महसूस भी कर लेगी वो। दुनिया से छिपा सकता है तू दुनिया को भुला सकता है तू हर दर्द, अपनी परेशानियां माँ से न छुपा सकता है तू वो जानती है, आहटें तेरी दिल में छुपे बातें तेरी जो किसी से न कह पायेगा वो भी माँ को ज़रूर बतलायेगा दुनिया जहां मुंह मोड़ भी ले पर साथ तेरा न छोड़ेगी हर इल्जाम तेरे और ज़िम्मेदारियाँ  वक़्त आने पर, अपने सिर पर भी ले लेगी। वो माँ ही है जिसके आगे  हर ताकत झुक जाती है वो माँ है जिसके कदमों पर जन्नत के रास्ते रुक जाते हैं। माँ पर अब क्या लिखूं। हम अगर शब्द है तो वो पुरी परिभाषा है माँ की यही परिभाषा है। दवा असर न करे तो नज़र उतारती है, वो माँ है जनाब, वो कहाँ हार मानती है। आप सभी को मातृ दिवस पर बहुत बधाइयां |                                                                ~RV ...

इंसानियत

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​मजहब मजहब खेल खेल कर​ राम रहीम को बांट दिया बुरा भला न देखा, इंसानियत को छाँट दिया हम भूल रहे  न रक्त अलग, न धर्म अलग दरअसल जो ये दरिंदे हैं हैवानियत के भक्त अलग वो खेलते रहे खून की होली न कुछ किया हम चुप रहे बोलते रहे आतंक की बोली हाथ धरे बैठे रहे मासूम ने क्या बिगाड़ा था? न देख सके तकलीफें उसकी अल्लाह कहां था भगवान कहां था जब गूंज रही थी चीखें उसकी चादर मैली हो गयी अब ध्वजा भी नीचे गिर गया हर इंसान का माथा अब लाज शर्म से झुक गया गलती हर उस वक़्त की थी जब हमने ढीला छोड़ दिया न्याय के बदले कानून  अब और भी अंधा हो गया न जाने कहाँ है खो गई इंसानियत इंसान की जिसकी कीमत ये हुई एक नन्ही सी जान की। Justice for Asifa Victim of kathua Kathua murder case

मनुष्य

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अंत का आरंभ है कैसा ये प्रारम्भ है मनुष्यता की आड़ में ये दृश्य कितना दम्भ है  ​ जल रहा मनुष्य है कैसा ये रहस्य है भागता है खोज में जिसके भूल कर ये हास्य है वर्तमान भूल कर कर चुका दशा है अपनी ज़िन्दगी का सुख भूला कर अर्थ की माला है जपनी आज है वो कल नही है भागता तू बाद जिसके जो गलत वो न सही कर तेरे हर काज संभलके एक दिन वो दूर नही न तो तू रह जायेगा न तेरा कुछ बच पायेगा वो कर्म तेरे और यादें ही लोगों में बस जाएगा सौभाग्य नही रोज़ जागती है न जीवन बाहों में रोज़ नापती है पड़े जिधर तेरी दृष्टि बस हँस उठे सारी सृष्टि कुछ ऐसा तू कर दिखा मनुष्यता का लाभ उठा होकर निर्भय  कर काज अजय हर नक्षत्र तुझे सोहराएगा कण कण धरती का सिंचाएगा जब अंत तेरा हो जाएगा                                                        ~RV

क्षितिज (Horizon)

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क्षितिज   दूर कहीं अनंत में मिल जाते हैं  आसमान और ज़मीन दायरों को तोड़ कर एक समस्त ब्रह्मांड को दूसरा लम्हों को जोड़ कर चाहे वो डूबता हो या फिर वो हो उगता सूरज की लालिमा आंखों को वश में कर लेती है न जाने कैसे प्रश्नों के उत्तर ढूंढने  अक्सर ये दुनिया उस क्षितिज को निहारती है  एक ख्वाब सा है वो एक अलग ही अंदाज़ है उसका किसी कलाकार के चित्र के जैसे प्रेमिका के मुख के जैसा देखते ही रहने का मन करता है उस डूबते आकाश के संग डूबने के मन करता है सागर की गहराइयों में  खो जाने का मन करता है ये कैसी माया है उसकी जो मोह लेता है आत्मा को लाल, बैंगनी, नारंगी, पीला हर रंग ले चलता है सांत्वना को भूल जाता हूं कभी कभी मानो दुनिया से परे हूँ मैं जैसे सारी दुनिया मुझमे बसती है और उसके दायरे में हूँ मैं  यूँ ही बैठे हुए मेरे सामने कुछ देखता हूं जैसे जैसे सूरज क्षितिज में ढलता है मेरे नज़रों के सामने, सारी परेशानियाँ भूलकर, प्रकृति के फ़िल्म को चलते हुए देखता हूँ। इस अनिश्चित जीवन में एक यही तो निश्चित लगता है अनंत तक फैला हुआ  यह क्षितिज ही सुनिश्चित लगता है।   ...

ऐसा मेरा देश है

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​सोने की चिड़िया है ये जिसे चुगने को दाना नही जो अनाज उगाता है उसके नसीब खाना नही सरहद पर जवान हैं न हिन्दू न मुसलमान हैं न सिख इसाई जैन है वो रक्षा करते औरों से यहाँ देश बना शमशान है अल्पबुद्धि काम को जाती गतिमान है स्वाभिमान है बुद्धी बाहर विदेश है जाती यह कैसा अपमान है घर घर नारी पूजी जाती देवि मैय्या सब कहलाती मगर अवस्था इस प्रकार है बाहर निकले को घबराती संस्कृति का पाठ पढ़ाए योग वेद का ज्ञान कराए आज देश की ये अवस्था विनम्रता न मन को भाए पिता देश के विश्व पे छाए अहिंसा के पुजारी आज पुत्र है रक्त बहाये,घर जलाये मानवता पर भारी ऐसा मेरा देश है यहां पेट न भरता किसान का डरता परिवार जवान का सक्षम सारे दर दर भटके युद्ध है गीता कुरान का                                                   ~RV